उत्तराखंड में नकली दवाओं के ऑनलाइन कारोबार के खुलासे के बाद अब एसटीएफ और औषधि प्रशासन विभाग के बीच टकराव की स्थिति बन गई है। एसटीएफ द्वारा जिन फैक्टरियों पर कार्रवाई की गई, अब औषधि प्रशासन उन्हीं फैक्टरियों के बचाव में उतर आया है। दोनों विभागों के अलग-अलग दावों ने पूरे मामले को और ज्यादा चर्चा में ला दिया है।
हाल ही में एसटीएफ ने नकली दवाओं के बड़े ऑनलाइन नेटवर्क का भंडाफोड़ करते हुए दो आरोपियों को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तार आरोपी गौरव त्यागी ने पूछताछ में खुलासा किया कि वह अपने भाई मयंक उर्फ मोंटी के साथ मिलकर हरिद्वार के भगवानपुर स्थित फैक्टरी में विभिन्न कंपनियों की नकली दवाएं तैयार कराता था। आरोपी फेसबुक पर “एसके हेल्थकेयर” नाम से पेज बनाकर ब्रांडेड दवाओं को बेहद कम कीमत पर बेचने का नेटवर्क चला रहे थे।
एसटीएफ ने पूछताछ से मिले इनपुट के आधार पर संबंधित फैक्टरी पर छापेमारी की और जांच शुरू की। एसटीएफ एसएसपी अजय सिंह ने कहा कि भगवानपुर स्थित फैक्टरी में प्रभावी कार्रवाई न होने की रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी। उन्होंने कहा कि मामले में नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जा रही है।
वहीं, सहायक औषधि नियंत्रक डॉ. सुधीर कुमार ने एसटीएफ की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जांच के दौरान संबंधित फैक्टरी में कोई अवैध गतिविधि या गलत सामग्री नहीं मिली। उन्होंने बताया कि हरिद्वार की फैक्टरी पूरी तरह वैध है और वर्ष 2023 से लाइसेंस लेकर दवाओं का निर्माण कर रही है।
डॉ. सुधीर कुमार के अनुसार, एसटीएफ की टीम के साथ दोनों स्थानों पर ड्रग इंस्पेक्टर भी मौजूद थे। कोटद्वार स्थित फैक्टरी में केवल रॉ मैटेरियल मिला था, जिसका एसटीएफ ने संदेह के आधार पर सैंपल लिया है। उनका दावा है कि हरिद्वार की फैक्टरी में भी कोई गैरकानूनी गतिविधि सामने नहीं आई।
इधर, एसटीएफ एसएसपी अजय सिंह ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार की सर्चिंग और सैंपलिंग के लिए औषधि निरीक्षक कानूनी रूप से अधिकृत होते हैं और कार्रवाई से पहले विभाग को विधिवत सूचना दी गई थी। उन्होंने बताया कि कोटद्वार सिडकुल स्थित फैक्टरी को नियमानुसार सील कर दिया गया है, जहां भारी मात्रा में दवा निर्माण सामग्री बरामद हुई है।
उन्होंने यह भी कहा कि दूसरी फैक्टरी पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो पाई, जिसकी प्रगति रिपोर्ट मांगी गई है। मामले में शासन को भी पत्र भेजा जाएगा।
गौरतलब है कि उत्तराखंड में विभागों के बीच टकराव का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले आबकारी विभाग और जिला प्रशासन के बीच शराब के ठेकों को लेकर भी विवाद सामने आ चुका है। अब नकली दवाओं के मामले में दो विभागों के अलग-अलग रुख ने पूरे प्रकरण को और संवेदनशील बना दिया है।