उत्तराखंड के 191 स्कूलों में पेयजल का संकट, गर्मी में बच्चों की बढ़ी परेशानी; पिथौरागढ़ सबसे अधिक प्रभावित

देहरादून: उत्तराखंड में सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं को लेकर एक चिंताजनक स्थिति सामने आई है। राज्य के 191 स्कूल ऐसे हैं जहां पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं है। गर्मी के बढ़ते तापमान के बीच इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को पीने के पानी के लिए भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

शिक्षा विभाग की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश के विभिन्न जिलों के राजकीय प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पेयजल सुविधा का अभाव है। इससे न केवल बच्चों की सेहत पर असर पड़ रहा है, बल्कि उनकी पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है।

रिपोर्ट के अनुसार, पिथौरागढ़ जिले में सबसे ज्यादा 89 स्कूल पेयजल विहीन हैं। इसके अलावा नैनीताल में 43, अल्मोड़ा में 15, पौड़ी गढ़वाल में 15, चंपावत में 13, देहरादून में 7, उत्तरकाशी में 6, रुद्रप्रयाग में 2 और टिहरी गढ़वाल में 1 स्कूल में भी पानी की व्यवस्था नहीं है। शिक्षकों का कहना है कि कुछ माध्यमिक विद्यालय भी इस समस्या से जूझ रहे हैं।

बच्चे घरों और दूरस्थ स्रोतों से ला रहे पानी
जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संघ के प्रांतीय अध्यक्ष विनोद थापा ने बताया कि जिन स्कूलों में पानी की सुविधा नहीं है, वहां बच्चे अपने घरों से या दूर-दराज के जल स्रोतों से पानी लाकर प्यास बुझा रहे हैं। गर्मी के दिनों में यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है।

वॉटर बेल के आदेश पर उठे सवाल
हीटवेव से बचाव के लिए राज्य के मुख्य सचिव ने स्कूलों में ‘वॉटर बेल’ बजाने के निर्देश दिए हैं, ताकि बच्चे समय-समय पर पानी पी सकें। हालांकि, जिन स्कूलों में पानी ही उपलब्ध नहीं है, वहां इस आदेश को लेकर सवाल उठ रहे हैं। शिक्षकों का कहना है कि पहले बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित की जानी चाहिए, उसके बाद ऐसे निर्देश लागू किए जाएं।

वैकल्पिक इंतजाम से चल रहा काम
अपर शिक्षा निदेशक पद्मेंद्र सकलानी के अनुसार, जल जीवन मिशन के तहत इन स्कूलों में पेयजल व्यवस्था सुनिश्चित करने के प्रयास जारी हैं। तब तक भोजन माताओं और अभिभावक संघों की मदद से बच्चों के लिए पीने का पानी और पीएम पोषण योजना के लिए पानी उपलब्ध कराया जा रहा है।

राज्य गठन के 25 साल बाद भी स्कूलों में पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा का अभाव शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। गर्मी के इस मौसम में यह समस्या बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।

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