हिंदी की स्थिति चिंताजनक: लेखन प्रतियोगिता में खुलासा; ‘देहरादून’ तक नहीं लिख पा रहे दून के स्कूलों के बच्चे

देहरादून | मुख्य संवाददाता उत्तराखंड की राजधानी और ‘शिक्षा के केंद्र’ के रूप में विख्यात देहरादून के स्कूलों में मातृभाषा हिंदी की स्थिति को लेकर एक डराने वाला खुलासा हुआ है। आधुनिक शिक्षा और विदेशी भाषाओं की अंधी दौड़ में छात्र अपनी जड़ों से इस कदर कट गए हैं कि वे हिंदी के सामान्य शब्द भी सही ढंग से नहीं लिख पा रहे हैं।

90 फीसदी छात्र ‘देहरादून’ लिखने में भी हुए फेल

अमर उजाला और डाक विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक विशेष लेखन प्रतियोगिता के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। प्रतियोगिता का उद्देश्य बच्चों की सृजनात्मकता और रचनात्मक लेखन को प्रोत्साहित करना था, लेकिन जब कक्षा 8वीं से 11वीं तक के छात्रों के पत्रों का मूल्यांकन किया गया, तो परिणाम निराशाजनक रहे।

रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) से संबद्ध प्रतिष्ठित स्कूलों के लगभग 90 प्रतिशत बच्चे ‘देहरादून’ जैसे सामान्य शब्द की वर्तनी (Spelling) सही नहीं लिख पाए। यह स्थिति किसी एक बच्चे या स्कूल की नहीं, बल्कि जिले के अधिकांश विद्यालयों की है।

आम बोलचाल के शब्दों में भारी अशुद्धियाँ

विशेषज्ञों ने जब बच्चों द्वारा लिखे गए पत्रों का विश्लेषण किया, तो पाया कि छात्र हिंदी के अत्यंत सरल और रोजमर्रा के शब्दों को लिखने में संघर्ष कर रहे हैं। पत्रों में निम्नलिखित शब्दों में सबसे अधिक गलतियाँ पाई गईं:

  • अशुद्ध शब्द: सरकार, वजह, स्कूल, उपाय, उत्तराखंड, शहर, अखबार, अंदर, बहुत, निवासी, निवेदन और अपराध।
  • हैरान करने वाली बात: कई छात्र पत्र में अपना स्वयं का नाम भी शुद्ध हिंदी में नहीं लिख सके।

विदेशी भाषाओं का क्रेज और हिंदी पर ‘जुर्माना’

आज के दौर में स्कूलों में अंग्रेजी, जर्मन और इटालियन जैसी विदेशी भाषाओं पर तो जोर दिया जा रहा है, लेकिन हिंदी को हाशिए पर धकेल दिया गया है। प्रतियोगिता के दौरान बच्चों ने एक कड़वी सच्चाई भी साझा की।

“यह समाज का दुर्भाग्य है कि अंग्रेजी बोलना आज बौद्धिकता का पैमाना बन गया है। कुछ विद्यालयों में हिंदी बोलने पर 10 से 20 रुपये तक का जुर्माना वसूला जा रहा है। बच्चों को अपनी ही मातृभाषा बोलने पर ‘अपराधी’ जैसा महसूस कराया जाता है।”

विशेषज्ञों की राय: सुधार के लिए ‘पठन’ अनिवार्य

एमकेपी पीजी कॉलेज की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. अलका मोहन ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि बच्चों में शब्द भंडार (Vocabulary) की कमी हो रही है। उन्होंने सुधार के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए:

  1. नियमित पठन: बच्चों को प्रतिदिन हिंदी अखबार, कहानियाँ और बाल साहित्य पढ़ने की आदत डालनी चाहिए।
  2. निरंतर अभ्यास: रोज कम से कम एक पैराग्राफ या अपने अनुभव लिखने से वर्तनी और अभिव्यक्ति में सुधार होगा।
  3. विशेष कक्षाएं: विद्यालयों को हिंदी व्याकरण और शुद्ध लेखन के लिए विशेष सत्र आयोजित करने चाहिए।

सिर्फ बच्चे नहीं, समाज भी जिम्मेदार

इस भाषाई गिरावट के लिए केवल बच्चे दोषी नहीं हैं। न तो स्कूलों में शिक्षक हिंदी को प्राथमिकता दे रहे हैं और न ही अभिभावक घर पर इस ओर ध्यान दे रहे हैं। हम बच्चों के अंग्रेजी बोलने पर तो गर्व करते हैं, लेकिन उनकी हिंदी की अशुद्धियों को नजरअंदाज कर देते हैं। यदि आज से ही इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ी अपनी भाषा और संस्कृति से पूरी तरह कट जाएगी।

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