देहरादून। उत्तराखंड में पेयजल की गुणवत्ता को लेकर सतर्कता बढ़ा दी गई है। नदियों, गाड़-गदेरों और अन्य प्राकृतिक जल स्रोतों में खतरनाक बैक्टीरिया, वायरस, फफूंद और परजीवियों की मौजूदगी की आशंका को देखते हुए अब प्रदेशभर में पेयजल की माइक्रोबायोलॉजी जांच शुरू करने की तैयारी की जा रही है। हाल में दूसरे शहर में दूषित पानी से जुड़े गंभीर मामलों के बाद राज्य स्तर पर यह निर्णय लिया गया है।
जल संस्थान के अंतर्गत प्रदेश में कुल 27 प्रयोगशालाएं संचालित हैं, जिनमें 13 जिलास्तरीय, एक राज्यस्तरीय और 13 उपखंडीय लैब शामिल हैं। वर्तमान में इन लैबों में पानी की केवल फिजियो-केमिकल जांच—जैसे पीएच, टीडीएस, क्लोराइड, फ्लोराइड और आयरन—की सुविधा उपलब्ध है। अब इन प्रयोगशालाओं को जैविक परीक्षण के लिए भी सक्षम बनाया जाएगा।
सभी प्रयोगशालाएं नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लैबोरेटरीज (NABL) से मान्यता प्राप्त हैं, लेकिन माइक्रोबायोलॉजी जांच के लिए अलग प्रमाणन आवश्यक है। विभाग ने इसके लिए मान्यता प्रक्रिया शुरू कर दी है।
शासन की ओर से माइक्रोबायोलॉजिकल जांच सुविधा विकसित करने हेतु 192 लाख रुपये का बजट जारी किया गया है। इस धनराशि से बायोसेफ्टी कैबिनेट, इंक्यूबेटर, ऑटोक्लेव, मेंब्रेन फिल्ट्रेशन यूनिट, कॉलोनी काउंटर, सूक्ष्मदर्शी और अन्य जरूरी उपकरण खरीदे जाएंगे।
अधिकारियों का कहना है कि उपकरणों की स्थापना और आवश्यक मान्यता मिलने के बाद सभी लैबों में नियमित रूप से पेयजल की माइक्रोबायोलॉजी जांच शुरू कर दी जाएगी। इससे जल स्रोतों की वास्तविक जैविक स्थिति का पता चलेगा और जलजनित रोगों की रोकथाम में मदद मिलेगी।