देहरादून। उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन के चलते पर्यावरणीय संकट गहराता जा रहा है। राज्य में एक तरफ जंगलों में आग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, तो दूसरी ओर अतिवृष्टि (औसत से अधिक बारिश) नई आपदाओं को जन्म दे रही है। बीते 16 वर्षों में 18 हजार से अधिक वनाग्नि की घटनाओं में 30 हजार हेक्टेयर से ज्यादा वन क्षेत्र प्रभावित हो चुका है।
प्रदेश के कुल 36,937 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में हर साल आग की घटनाएं सामने आती हैं। वर्ष 2010 से 2025 के बीच राज्य में 18,074 वनाग्नि की घटनाएं दर्ज की गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलता मौसम चक्र और जलवायु परिवर्तन इसके प्रमुख कारण हैं।
सर्दियों में सूखे जंगल, गर्मियों में भड़कती आग
विशेषज्ञों के अनुसार सर्दियों में कम बारिश और बर्फबारी के कारण जंगलों में नमी की कमी हो जाती है, जिससे वे सूखकर अत्यधिक ज्वलनशील बन जाते हैं। यही वजह है कि गर्मी के मौसम में आग तेजी से फैलती है।
मुख्य वन संरक्षक सुशांत पटनायक के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के चलते तापमान में वृद्धि हो रही है, जिससे वनाग्नि की घटनाओं में इजाफा हुआ है। उन्होंने कहा कि मौसम के पैटर्न में बदलाव सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन का संकेत है।
संवेदनशील जिले
वन विभाग के मुताबिक पौड़ी गढ़वाल, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जिले वनाग्नि के लिहाज से सबसे अधिक संवेदनशील हैं। इन क्षेत्रों में हर साल बड़ी संख्या में आग की घटनाएं सामने आती हैं, जिससे जैव विविधता को नुकसान होता है।
हालिया घटनाएं
नवंबर 2025 से 14 फरवरी 2026 के बीच प्रदेश में 61 वनाग्नि की घटनाएं हुईं। इस दौरान नंदा देवी बायोस्फीयर क्षेत्र के जंगल भी आग की चपेट में आए, जहां आग ऊंचाई वाले इलाकों तक फैल गई थी।
वहीं 15 फरवरी से 21 अप्रैल 2026 तक 144 घटनाओं में करीब 85 हेक्टेयर वन क्षेत्र और जैव विविधता को नुकसान पहुंचा है।
बदलता वर्षा पैटर्न बढ़ा रहा खतरा
उत्तराखंड में बारिश का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। जुलाई 2025 में 350.2 मिमी वर्षा दर्ज की गई, जो सामान्य 417.8 मिमी से कम थी, लेकिन इससे पहले के वर्षों (2022, 2023 और 2024) में औसत से अधिक बारिश हुई। अगस्त 2024 और 2025 में भी सामान्य से ज्यादा वर्षा दर्ज की गई।
वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत के अनुसार कम समय में अत्यधिक बारिश होने से आपदाओं की तीव्रता बढ़ रही है। पिछले वर्ष हर्षिल, धराली समेत कई क्षेत्रों में भारी नुकसान हुआ। इसके अलावा छेनागाड, ताल जामण, तमकनाला, थराली, चेपड़ों, मोपाटा, पौसारी, बैसानी, थाने, भुजियाघाट, गुदमी और स्यानाचट्टी जैसे क्षेत्रों में भी आपदाएं दर्ज की गईं।
बढ़ता खतरा, जरूरी समाधान
विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में आग और अतिवृष्टि का संयुक्त प्रभाव न केवल पर्यावरण बल्कि स्थानीय जनजीवन, वन्यजीव और अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर असर डाल रहा है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहरा सकता है।