हरिद्वार: हरकी पैड़ी पर गैर हिंदुओं का प्रवेश निषेध, रील-वीडियो बनाने पर भी सख्त पाबंदी

हरिद्वार।
धर्मनगरी हरिद्वार में गंगा घाटों की पवित्रता और धार्मिक मर्यादा बनाए रखने के लिए श्रीगंगा सभा ने कड़े नियम लागू किए हैं। हरकी पैड़ी, मालवीय द्वीप और अन्य प्रमुख घाटों पर गैर हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है। इस संबंध में शुक्रवार को घाटों और आसपास के क्षेत्रों में सूचना बोर्ड और बैनर लगाए गए, जिनमें नियमों के उल्लंघन पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।

श्रीगंगा सभा द्वारा लगाए गए बोर्डों में साफ तौर पर उल्लेख किया गया है कि घाटों पर फिल्मी गीतों पर वीडियो या सोशल मीडिया रील बनाना पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। यदि इस प्रकार का कोई वीडियो या रील किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित होती है, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

श्रीगंगा सभा का कहना है कि यह निर्णय ब्रिटिश शासनकाल में लागू म्यूनिसिपल एक्ट के प्रावधानों के अनुरूप लिया गया है। उस समय हरिद्वार को एक पवित्र धार्मिक नगर के रूप में संरक्षित करने के लिए विशेष नियम बनाए गए थे, जिनका उद्देश्य तीर्थ की गरिमा बनाए रखना था।

हरकी पैड़ी समेत अन्य घाटों पर लगाए गए इन बोर्डों को लेकर दिनभर चर्चाएं होती रहीं। स्थानीय व्यापारी वर्ग और श्रद्धालुओं ने इस कदम को सनातन धर्म और धार्मिक परंपराओं की रक्षा की दिशा में उठाया गया जरूरी कदम बताया है। उनका कहना है कि हाल के दिनों में घाटों पर अनुचित गतिविधियों में वृद्धि देखी जा रही थी, जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हो रही थीं।

श्रीगंगा सभा के अध्यक्ष नितिन गौतम ने कहा कि तीर्थ स्थलों की मर्यादा बनाए रखना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि हरिद्वार आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को यहां की धार्मिक परंपराओं और नियमों का पालन करना चाहिए। सनातन संस्कृति के संरक्षण के लिए इस तरह के निर्णय आवश्यक हो गए हैं।

श्रीगंगा सभा का ऐतिहासिक योगदान
श्रीगंगा सभा की स्थापना वर्ष 1916 में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने तीर्थ पुरोहितों और महंतों के साथ मिलकर की थी। इसका उद्देश्य गंगा की अविरल धारा और पवित्र स्वरूप की रक्षा करना था। अंग्रेजी शासनकाल में बनाए जा रहे बांधों और अवरोधों के विरोध में महामना के प्रयासों से गंगा की धारा को अविरल बनाए रखने में सफलता मिली।

इतिहासकारों के अनुसार, ब्रिटिश शासन के दौरान भी हरिद्वार को हिंदू सनातन संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र माना गया था। इसी कारण शहर को म्यूनिसिपल दर्जा दिया गया और तीन किलोमीटर की परिधि में मांस और मदिरा की बिक्री व सेवन पर प्रतिबंध लगाया गया था।

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