यूरोपीय संघ (EU) द्वारा लागू किए जा रहे कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) को लेकर कांग्रेस ने गहरी चिंता व्यक्त की है। पार्टी का कहना है कि यह कार्बन टैक्स भारतीय निर्यातकों के लिए नुकसानदायक साबित होगा और विशेष रूप से इस्पात व एल्युमिनियम जैसे प्रमुख क्षेत्रों की लागत में भारी बढ़ोतरी करेगा। कांग्रेस ने इसे भारतीय निर्यात के लिए “अस्वीकार्य गैर-शुल्कीय बाधा” बताते हुए मांग की है कि प्रस्तावित भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते (FTA) में इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया जाए।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि लंबे समय से लंबित भारत-ईयू एफटीए को इस महीने अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है। ऐसे में ईयू का कार्बन टैक्स भारतीय उद्योगों के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। उन्होंने बताया कि गुरुवार से भारतीय स्टील और एल्युमिनियम निर्यातकों को यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों में निर्यात पर कार्बन टैक्स का सामना करना पड़ेगा।
जयराम रमेश के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का ईयू को स्टील और एल्युमिनियम निर्यात औसतन 5.8 अरब डॉलर रहा, जबकि पिछले वर्ष यह आंकड़ा करीब 7 अरब डॉलर था। उन्होंने कहा कि यह गिरावट सीबीएएम लागू होने की तैयारी के चलते पहले ही शुरू हो चुकी थी, जो आगे और गहराने की आशंका है।
कांग्रेस नेता ने ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के आकलन का हवाला देते हुए कहा कि कई भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए अपने उत्पादों की कीमतें 15 से 22 प्रतिशत तक घटानी पड़ सकती हैं। ऐसा इसलिए करना होगा ताकि यूरोपीय आयातक उसी मार्जिन से कार्बन टैक्स का भुगतान कर सकें। इसके साथ ही, कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी विस्तृत रिपोर्टिंग और जटिल दस्तावेजी प्रक्रियाएं भी भारतीय निर्यातकों पर अतिरिक्त बोझ डालेंगी।
1 जनवरी 2026 से लागू हुआ सीबीएएम
यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) 1 जनवरी 2026 से कुछ चुनिंदा धातुओं पर लागू हो गया है। यह कदम भारत के एल्युमिनियम और इस्पात निर्यातकों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए कीमतों में कटौती करना कई निर्यातकों की मजबूरी बन सकती है।
हालांकि, औपचारिक रूप से कार्बन टैक्स का भुगतान भारतीय निर्यातकों को नहीं करना होगा। यह जिम्मेदारी यूरोपीय संघ में स्थित उन आयातकों की होगी, जो अधिकृत सीबीएएम घोषणाकर्ता के रूप में पंजीकृत हैं। इन्हें आयातित वस्तुओं में निहित कार्बन उत्सर्जन के आधार पर सीबीएएम प्रमाणपत्र खरीदने होंगे। लेकिन इसका आर्थिक भार अंततः भारतीय निर्यातकों पर ही पड़ेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोपीय संघ उन उत्पादों पर कार्बन टैक्स लगा रहा है, जिनके उत्पादन के दौरान अधिक कार्बन उत्सर्जन होता है। इस्पात क्षेत्र में ब्लास्ट फर्नेस-बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस मार्ग में उत्सर्जन सबसे अधिक होता है, जबकि गैस आधारित डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI) और कबाड़ आधारित इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस में यह अपेक्षाकृत कम होता है। वहीं, एल्युमिनियम उत्पादन में बिजली का स्रोत और ऊर्जा की खपत कार्बन लागत तय करने में अहम भूमिका निभाती है।
कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि यदि भारत-ईयू एफटीए में इस कार्बन टैक्स को लेकर संतोषजनक समाधान नहीं निकाला गया, तो इसका सीधा असर भारतीय निर्यात, उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और रोजगार पर पड़ सकता है।